INK Business पे है सिर्फ इनकी Monopoly? | Business Case Study

INK Business

INK Business: यह स्याही जिसकी उंगली पे है वो देश की कहानी लिख रहे हैं, इस स्याही के पीछे की कहानी क्या है आज हम आपको बताएंगे यह स्याही कौन सी कंपनी बनाती है? सरकार को बनाने वाली है, सही कोई सरकारी कंपनी बनाती है या अडानी अंबानी जैसी प्राइवेट कंपनी ये सही सप्लाई करने वाली कई कंपनियां नहीं है पूरे भारत में मात्र एक कंपनी है जो ये सई सप्लाई करती है और पिछले 60 सालों से ये एक ही वेंडर है। जो पूरी भारत सरकार को यह स्याही उपलब्ध करवाता है।

अब आप सोच रहे होंगे अगर ऐसा इसका बिजनेस है, तो इलेक्शन ईयर में तो बहुत कमाता होगा पर जब इलेक्शन ईयर नहीं है तब ये क्या करता होगा आगे बताऊंगा जहां बड़ी-बड़ी कंपनियों में प्रोडक्ट को लेके कंप्लेंट आती रहती है। इस स्याही की क्वालिटी को लेके पिछले 60 साल में एक भी कंप्लेंट नहीं आई है तो आखिर ये इंक कब से लगने लगी आखिर ये एक ही कंपनी क्यों हैय जो इंक सप्लाई करती है। बाकी लोग ऐसा क्यों नहीं कर पाते ये कैसे इंक बनाते हैं? कैसे इलेक्शन कमीशन तक पहुंचाते हैं? कितने एंप्लॉई हैं कितना टर्नओवर है कितना प्रॉफिट है सब का सब बताएगा।

स्याही को बनाने वाली कंपनी

इस स्याही को बनाने वाली कंपनी का नाम है मैसूर पेंट एंड वार्निश लिमिटेड MPVL. ये कंपनी बनाई थी 1937 में मैसूर के महाराजा कृष्ण राजा बडियार द फोर्थ आजादी से पहले ये प्राइवेट कंपनी थी। लेकिन जब देश आजाद हुआ तो इसको सरकारी कंपनी बना दिया गया और ये कंपनी आती है कर्नाटक सरकार के अंतर्गत इस कंपनी का कोई मालिक नहीं है। इस कंपनी का जो ओनर है वो या तो इंडस्ट्री मिनिस्टर होता है या इंडस्ट्री का सेक्रेटरी होता है और जबजब सरकार बदलती है, ये लोग बदलते रहते हैं तो क्या शुरुआत होते ही इंक बनाने लग गए थे। नहीं उस समय तो इनका आ ही नहीं थी

इनका पहला प्रोडक्ट था सीलिंग वैक्स सर वो क्या होता है? याद है किसी जगह रेड पड़ती है या ताले पे पूरी सील लगाई जाती है, वो लाल कलर की लंबी सी आती है। उसको गर्म करके लगाते हैं फिर टप्पा मारते हैं वो इनका पहला प्रोडक्ट था और वो प्रोडक्ट आज भी इंडियन पोस्ट ऑफिस में काम में लिया जाता है और इलेक्शन कमीशन जब बैलेट बॉक्स पे बंद करके ठप्प लगाता है तो ये चीज काम में ली जाती है और देसी भाषा में इसको हमारे राजस्थान में चपड़ कहते हैं तो सर जी ये तो कंपनी चपड़ बना रही थी।

शाही कब से बनाने लगी 1951-52 में देश में पहली बार इलेक्शन हुए। उसमें दबा के धांधली हुई फिर 1957 हुए उसमें भी दबा के धांधली हुई तो चुनाव आयोग पे प्रेशर आया कि भैया ये तो धालिया हो रही है। एक-एक आदमी इतनी बार वोट करके जा रहा है। क्या करें तो उंगली पे शाही लगा दो तो 1962 में जब इलेक्शन हुआ वहां पहली बार इस शाही का प्रयोग किया गया तो आप बोले वोटर आईडी से भी तो आइडेंटिफिकेशन इंट्रोड्यूस हुई है। 1993 में ये वोटर आईडी से पहले की चीज है। इस सही को बनाया है नेशनल फिजिक्स लेबोरेटरी ने और उसके तीन साइंटिस्ट ने और ये पेटेंट इन्हीं के पास है तो जिसके पास पेटेंट है।

एवरेज टर्नओवर

वही बनाएगा तो ये सई तो इतनी सी लगती है इतनी सी सई में कमाई बवाई कर लेते हैं क्या और चलो इलेक्शन ईयर में तो कमा लेते होंगे नॉन इलेक्शन ईयर में क्या करते हैं तो एवरेज इनका जो टर्नओवर है। जब देश के लोकसभा इलेक्शन नहीं होती तब इनका एवरेज टर्नओवर होता है 30 करोड़ और एवरेज प्रॉफिट कमाते हैं ये ₹4 करोड़ और जब इलेक्शन आ जाता है। तब ये वॉल्यूम बढ़ जाता है जिसे पिछली बार जब इलेक्शन 2019 में हुए थे इस कंपनी ने कमाए थे ₹61करोड़ की सेल हुई थी। 13 करोड़ का प्रॉफिट था और इस साल अंदाजा है कि लगभग 80 करोड़ की सेल ये कर लेंगे इस कंपनी में टोटल 100 एंप्लॉई काम करते हैं और 100 एंप्लॉई कौन से हैं सरकारी आदमी है सारे के सारे अच्छा जब देश के चुनाव होते हैं।

लोकसभा के वहां तो बड़ी सेल आ जाती है ये 30 करोड़ कहां से आता है? अरे भाई साहब स्टेट में भी तो इलेक्शन होते रहते हैं कहीं राजस्थान का हो रहा है ।कहीं गोवा का हो रहा है। तो वहां से थोड़ी बहुत इनकम आती है इसके अलावा ये शाही एक्सपोर्ट भी करते हैं 30 से ज्यादा देशों में अब तक ये शाही एक्सपोर्ट एक्ट कर चुके हैं। ये कहां-कहां इनकी शाही एक्सपोर्ट होती है? नाम: मलेशिया, कंबोडिया, मंगोलिया, साउथ अफ्रीका, नेपाल, घना, डेनमार्क और 2004-05 में ये पाकिस्तान और अफगानिस्तान को भी सप्लाई किए थे।

5% रेवेन्यू सिर्फ सई

इनका जो मुख्य रेवेन्यू है 75% रेवेन्यू सिर्फ सई से आता है 25% तो ये छोटी-मोटी चीजें इंडस्ट्रियल पेंट बना दिया, इनामेेल बना दिया, प्राइमर बना दिया, पॉक्सी कोटिंग जो इंडस्ट्री को काम में आता है। छोटा मोटा काम वो कर लेते हैं और मुख्य काम तो इंक ही है ये इंक बनाने का प्रोसेस कैसे क्या रहता है। इस पूरी सप्लाई इनको समझाइए इनको देश के चुनाव में इंक बनाने में लगभग 3 महीने का समय लगता है।

इलेक्शन कमीशन इलेक्शन की डेट घोषित होने से पहले इनसे संपर्क करता है कि भाई उस टाइम तक तू दे पाएगा कि नहीं दे पाएगा तो जब ये डेट अनाउंस होती है तो उन तीन महीनों में इन 100 के 100 स्टाफ की छुट्टियां कैंसिल कर दी जाती है। कोई छुट्टी नहीं जाएगा बल्कि 50 आदमी कांट्रैक्ट और लिए जाते हैं। और 90 दिन दिन रात लग के ये इंक बनाते हैं। इस साल 2024 के इलेक्शन में चुनाव आयोग ने पीओ जारी किया 26,56,000 फाइल्स का फाइल्स मतलब ये शीशी होती है। जिसके अंदर ये इंक आती है इन्होंने 25 दिसंबर से प्रोडक्शन चालू किया 22 मार्च को सब कुछ समेट के रख दिया। जैसे-जैसे इंक बनने लग जाती है अलग-अलग राज्यों में जहां भी चुनाव आयोग का हेड क्वार्टर है वहां पे ये पहुंचाने लग जाते हैं सबसे पहले पहुंचाते हैं।

स्याही की जाँच कितनी बार की जाती है?

उन इलाकों में जो दूर है जैसे नॉर्थ ईस्ट एरिया में मणिपुर में नागालैंड में वहां पहले पहुंचाते हैं। फिर मुख्य जगहों पे धीरे-धीरे बाद में पहुंचाते हैं। जब से 1962 से लिंक लगने लगी है तब से लेकर 2024 तक आज तक एक भी ऐसा इंसीडेंस नहीं आया जब इनकी क्वालिटी को लेके कोई डाउट हुआ हो या ये क्वालिटी टेस्ट में फेल हुए हो। इसके पीछे का कारण क्या है? ये भाई साब इसको मल्टीपल टाइम चेक करते हैं

सबसे पहले तो इसका रॉ मटेरियल आता है ना उसी समय चेक कर लेते हैं कि रॉ-मटेरियल ठीक है कि नहीं फिर दोबारा जब प्रोडक्शन कर लेते हैं प्रोडक्शन के बाद दोबारा चेक कर लेते हैं। कि भैया ठीक है कि नहीं फिर इसको जब फाइल में भर रहे होते हैं भरते टाइम चेक कर लेते हैं कि भाई ठीक है तो नहीं फिर भरने के बाद जब भेजते हैं उस टाइम चौथी बार चेक कर लेते हैं फिर जब ये भेजते हैं जैसे इन्होंने यहां से बनाई और भेजी मध्य प्रदेश के चुनाव आयोग के हेड क्वार्टर में तो व हेड क्वार्टर में पहुंचने के बाद फिर चेक होती है उसके बाद ये आगे रवाना करते हैं हर लेवल पे चेकिंग होती है।

क्वालिटी के साथ-साथ क्वांटिटी का भी ध्यान

इसलिए आज तक शिकायत नहीं आई और मौके कुछ दिक्कत कभी नहीं हुई ल जीी क्वालिटी चेक कैसे करते हैं सब उस इंक को हटाने का प्रयास करते हैं। लगभग हर चीज से नींबू का जूस लगा दिया पपीते का जूस लगा दिया। शैंपू, ऑयल, नेल पॉलिश, रिमूवर सब लगा लगा के टाय करते हैं। इसको उसमें जोड़ जाड़ के जब लगता है ना किसी से नहीं हट रहा फिर ये क्वालिटी में पास मानी जाती है। अच्छा इनको य क्वालिटी के साथ-साथ क्वांटिटी का भी ध्यान रखना जरूरी है जैसे नॉर्मली एक बूथ पे दो फाइल जाती है एक फाइल में 700 वोटर के उन पे शई लग सकती है दो पे 1400 लगभग एक बूथ पे इतने ही लोग होते हैं

अगर एक बूथ पे दो फाइल दे दे और वो आधी भरी हुई हो तो भाई साहब कुछ वोटर रह जाएंगे तो ये भी आज तक एक भी बार नहीं हुआ ना क्वालिटी कंपनी ना क्वांटिटी तो साब ये तो बहुत बढ़िया कंपनी है।

इसके पास तो रेडीमेड ऑर्डर है। गवर्नमेंट हमेशा चुनाव करवाएगी हमेशा पैसा बॉर्डर देगी हमेशा रेवेन्यू होगा हमेशा प्रॉफिट होगा मजे ही मजे भया इतने मजे नहीं होते जिंदगी में कुछ रिस्क भी होता है। अब इनकी जिंदगी में क्या रिस्क है? वो सुन लो पहला रिस्क ये है कि हमारा 75% रेवेन्यू इस इंक से आ है कल को इस इंक में कुछ आगे पीछे ऊपर नीचे हो गया तो हमारी रेवेन्यू तो एक ही बार में जीरो हो जाएगी जैसे वन नेशन वन इलेक्शन ये कह रहे हैं हो सकता है। देश के लिए बहुत अच्छा हो लेकिन हमारे लिए तो बहुत बुरा है जैसे ही वन नेशन इलेक्शन होगा हमारी डिमांड आदी हो जाएगी।

इनकी जिंदगी में क्या रिस्क है?

दूसरा बाहर 30 कंट्री में एक्सपोर्ट कर रहे हैं तो नॉर्मली हम सोचते हैं। आज 30 में कर रहे हैं कल 60 में करेंगे नहीं साहब आज 30 में कर रहे हैं। अगले साल 25 में ही कर पाएंगे क्योंकि धीरे-धीरे जो कंट्रीज है वो शाही से बायोमेट्रिक की तरफ जा रही है तो इनका एक्सपोर्ट भी धीरे-धीरे कम होगा और हो सकता है। आज के देश में 10 साल बाद 20 साल बाद भारत वाले भी कहते हैं। शाही छोड़ो बायोमेट्रिक ही कर लेंगे तो भाई साहब फिर तो हमारा पूरा ही गया दूसरी प्रॉब्लम है कि भैया इनका प्लांट एकदम इनएफिशिएंट तरीके से चलता है।

इनएफिशिएंट का मतलब जो काम ₹100 में होना चाहिए वो काम 150 में होता है। ये तो प्रॉफिट में इसलिए है, क्योंकि इनके पास चुनाव आयोग हमेशा ऑर्डर लेके खड़ा होता है और जो रेट ये बोलेंगे उस रेट पे काम हो जाता है। अगर ये नॉर्मल कंपटीशन में उतर जाए बाजार में टिक ही नहीं सकते क्योंकि इनके एंप्लॉई की सैलरी नॉर्मल एंप्लॉई की तुलना में डबल है। Asian paint कोई आदमी रखेगा उसको सैलरी 25000 देता होगा ये तो सरकारी आदमी है लग गए जो लग गए हर साल भाई साहब वेतन भी पढ़ता है काम करो चाहे ना करो जाते और नहीं है तो सैलरी भी डबल है काम भी थोड़ा कम है प्लस इनके पास ऑर्डर लिमिटेड है।

हमने नहीं बदलाव किया तो कभी भी हमारी कंपनी खत्म हो सकती है

जब जब जितना मांगेंगे उतना ही मांगेंगे ऐसी मर्जी थोड़ी कि अबकी बार 26 लाख थी अगली बार भाई साहब हम तो 50 लाख कर देंगे जितनी डिमांड आए इतनी डिमांड है तो मशीन इनकी पुरानी है कई मशीने तो ऐसी है जो उस समय अंग्रेजों के टाइम पे लंडन से मंगाई गई थी ना राजा साहब लाए थे वही मशीने चल रही है अभी भी तो ना मशीने बदली ना एंप्लॉई बहुत पुराने हो गए सैलरी बहुत बढ़ गई है काम आगे नहीं बढ़ सकता तो इनका प्रॉफिट ये कह रहे हैं कि अगर हमने नहीं बदलाव किया तो कभी भी हमारी कंपनी खत्म हो सकती है और ऐसा हमेशा होता है।

मोनोपोली कंपनी में जहां आपको लगता है ना कि कई ऐसे पुराने लोग हैं जो कहते हैं हमारा काम तो चल रहा है। वो समय के साथ नहीं बदलते फर समय उनको बदल देता है। अच्छा पैसा बहुत है इनकी कंपनी की बैलेंस शीट में 74 करोड़ का रिजर्व पड़ा है आज तक जो कमाया पूरा पढ़ाई है। सरकारी कंपनी है पैसा तो है अब वो इच्छा नहीं है अप्रूवल नहीं है लेकिन ये प्रयास कर रहे हैं कि भैया नई मशीनरी लेके आएंगे नई प्रोसेस लगाएंगे आईटी लेके आएंगे और धीरे-धीरे हम इंक से डिपेंडेंस हटा के चार नए प्रोडक्ट और बनाएंगे तो ये प्रोडक्ट सोच रहे हैं कि डेकोरेटिव पेंट में चले जाए।

डेकोरेटिव पेंट

आज तक तो इंडस्ट्रियल पेंट में थे। अब डेकोरेटिव पेंट में जाएंगे अब आप सोचेंगे डेकोरेटिव पेंट में तो एशियन पेंट बर्जर पेंट जेस डब्लू ग्रासिम इसको जीने ही नहीं देंगे बात तो सही है, तो इसने कहा उसमें भी हम सर पेंट तो बनाएंगे B2B नहीं जाएंगे ना B2C जाएंगे हम तो B2G जाएंगे गवर्नमेंट को ही बोलेंगे। तुम्हारी बिल्ट के काम दे दो यही हमारे लिए बढ़िया है और गवर्नमेंट की पीएसयू गवर्नमेंट का काम भी कर लेगी इस लिहाज से ये आगे जाके कंपनी खुद को परिवर्तन करने में लगी हुई है

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